मैं, तुम और शायरी...!
मैं, तुम और शायरी...तसव्वुर की सैरगाहों में ,धुंध पर चलते रहे।सोया किए ओढ़ कर ,जुल्फों की सियाह रातें ।देखा किए साझा ,मुस्तक़्बिल के हसीन ख़्वाब।ग़मे-हस्ती,ग़मे-सामां अशआर में ढलते रहे ।मैं,तुम और शायरी...इक दूसरे के ज़ेहन की रानाइयों में डूबे थे ...कि...
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naturica
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[18 Mar 2009 11:22 AM]



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