हर तरफ़ आह आह है जैसे
हर तरफ़ आह आह है जैसे ये जहां कत्लगाह है जैसे अब सदाकत गुनाह है जैसे झूठ से ही निबाह है जैसे इश्क की इब्तिदा में ऐसा लगा सीधी - सादी सी राह है जैसे हर किसी ने किया यहाँ सिजदा आरजू खानकाह है जैसे खौफ से हम सिमट गए इतना कोई फरदे - तबाह है जैसे पेश आता...
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Rahul kundra
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[18 Mar 2009 06:16 AM]



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