तेरी उफ़, हर अदा के वो उजाले याद आते हैं।
आप सभी को मेरा नमस्कार, आज मैं जो ग़ज़ल यहाँ लगा रहा हूँ, उसे आप गुरु जी और हठीला जी द्वारा आयोजित किए गए तरही मुशायेरे में पहले ही पढ़ चुके होंगे। अपने आप में अद्भुत मुशयेरा था ये, मैं भी पहली बार मसहिया ग़ज़ल लिखी है। अब आप ही बताएँगे की मैं अपनी इस कोश...
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अंकित "सफ़र"
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[18 Mar 2009 01:37 AM]



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