ग़ज़ल
सज़ा मेरी ख़ताओं की मुझे दे दे। मेरे ईश्वर मेरे बच्चों को हँसने दे। इशारे पर चला आया यहाँ तक मैं, यहाँ से अब कहाँ जाऊँ इशारे दे। विरासत में मिलीं हैं ख़ुशबुऍ मुझको, ये दौलत तू मुझे यूँ ही लुटाने दे। मैं ख़ुश हूँ इस गरीबी मैं, फकीरी मैं, मैं जैसा हूँ,...
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sanjeev gautam
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[17 Mar 2009 09:26 AM]



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