दोहे

कुछ सोंचा कुछ बाक़ी है अरस शमन है प्रगति का घमंड वीरवशान क्रोध खंगारत रिश्ते को तजहूँ समय धरि ध्यान ॥ सुरभि चमके सुरभि में तारा ज्यों द्विज पास मानव चमके शुद्धाचरण धरि संतन के आश ॥ अनंत शर्म निज कर्म पर चखि अरस कर स्वाद सोवत विगत समुन्नत लखि रोवत होत बर्बाद ॥ अनिल गुरु सन... [पूरी पोस्ट]
writer anilpandey
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[17 Mar 2009 08:06 AM]

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