देह में बज रही बांसुरी
चांदनी में घुलीं भोर की रश्मियां दूध में टेसुओं की घुली पांखुरी केसरी क्यारियों से उठी गंध की आपकी देह में बज रही बांसुरी यों लगा आज रतिकान्त की चाहना शिल्प में ढल के आई मेरे सामने याकि वरदान बन कर संवर आई है कामनाओं के जल से भरी आंजुरी...
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Geetkaar
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[16 Mar 2009 21:19 PM]



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