नाले याद आते हैं
बहाईं थीं जहां फ़ाकिर ने कागज़ की कभी कश्तीकि जिसके साहिलों पर मजनुऒं की बस्तियां बसतींजहां हसरत तमन्ना के गले को घोंट देती थीलगा कर लोट जिसमें भेंस दिन भर थी पड़ी हँसतीहरे वो रंग पानी के औ: काले याद आते हैंतुम्हारे शहर के वो गन्दे नाले याद आते हैंनहीं...
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राकेश खंडेलवाल
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[16 Mar 2009 21:15 PM]



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