उन्मुक्त हँसी
पगडंडी पे चले जा रहे वे झुंड के झुंड स्त्रियों के सिर पर दितवार के हाट से खरीदे सामान की पोटलियाँ झुनझुना बजाते उनकी गोद में बच्चे ज़्यादातर आदमी ख़ाली हाथ धोंकते हुए बीड़ियाँ आपस की बातचीत में खिलखिलाते उन्मुक्त गूँज जाती हँसी सुनसान जंगल में भला क्या...
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sareetha
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[13 Mar 2009 23:44 PM]



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