दुश्मन तो मगर मुझको,बराबर का चाहिये ....गज़ल

मैं समय हूँ ... सादर अभिवादन कल रात एक गज़ल के 4 - 5 शेर हुये हैं सबसे पहले आप के साथ ही बांट रहा हू देखियेगा .. रोटी का चाहिये , न मुझे घर का चाहिये लेकिन मुझे हिसाब, कटे सर का चाहिये कमतर से दोस्ती मे शिकायत नहीं मुझे दुश्मन तो मगर मुझको,बराबर का चाहिये ऐसी लहर उठा... [पूरी पोस्ट]
writer डा. उदय ’ मणि ’
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[13 Mar 2009 04:49 AM]

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