दिन शराब के
तुम क्या गए फिर लौट आए दिन शराब के भीगती साँसे डूबती आँखे दिल-ऐ-बेताब के रातो को बरसते है बादल कुछ ऐसे टूटके छलक जाते है शब-ऐ-ग़म अश्क माहताब के मत जाना चमन में कि माहौल ठीक नही बहकी है कलियाँ बदले है मिजाज़ गुलाब के मयक़दे में भी गए मगर तेरा ज़िक्र न...
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tarun
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[10 Mar 2009 02:07 AM]



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