न बीतने वाली रात
हमारे तुम्हारे बीच का फासला बहुत लम्बा था मैं कितना भी चलता नहीं पहुच पाता जब तक कि तुम कदम न उठाते। चांदनी में नहाना और बात है पर उचककर चाँद को छुआ नहीं जाता। मेरे हौसले के क्षत विक्षत पैरों से अविरल बहते रक्त को मेरी आस की कातर नजरें सुखा नहीं पा र...
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प्रताप नारायण सिंह
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[09 Mar 2009 03:10 AM]



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