गुनाह होते हुऎ देखा

लम्हें जिन्दगी के मैने खुद को ही तबाह होते हुऎ देखा , जर्रे जर्रे में गुनाह होते हुऎ देखा । रग रग में लहू बन के जो दौड़ता था, मैनें उसको भी स्याह होते हुऎ देखा । उचाँईयों से ना मेरा जिक्र करो , खुद को गर्दिश में पनाह होते हुऎ देखा । जो समझता था मुझे मुझसे ज्यादा , मैने... [पूरी पोस्ट]
writer hemjyotsana "Deep"

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[08 Mar 2009 20:29 PM]

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