हिन्दी निकष
मेरी पिछली ग़ज़ल में रदीफ़ "दो" था और इस ग़ज़ल में भी यही रदीफ़ है. दोनों "दो" के अर्थ अलग अलग हैं. बताइयेगा की इस तज़रबे में मैं कितना कामयाब रहा- पेशे-नज़र है ये ग़ज़ल- ग़ज़ल : कोई हमदम या............... कोई हमदम या कोई कातिल दो। मेरी कश्ती को एक साहिल दो....
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आनंदकृष्ण
ग़ज़ल
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[08 Mar 2009 13:05 PM]



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