केवल सबला हो
नारी तुम.... केवल सबला हो निमर्म प्रकृति के फन्दों में झूलती कोई अर्गला हो । नारी तुम... केवल सबला हो । विष देकर अमृत बरसाती हाँ ढ़ाँप रही कैसी थाती । विषदन्त पुरूष की निष्ठुरता करूणा के टुकड़े कर जाती विस्मृति में खो जाती ऐसे जैसे भूला सा पगला हो ना...
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शोभा
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[08 Mar 2009 00:24 AM]



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