हाथ से फिसलते समय के दुःख की कविताएँ
डर तरह-तरह के डिजाइनों में उपलब्ध थे / बाजार उन्हीं के बल खड़ा था / पिछड़ जाने का डर / सबकुछ चला रहा था / उसमें गति इतनी कि / कई पहिये गले रेतते निकल जाते / पर दिखते नहीं /..../ धर्म पर सवार था / उसकी भव्य मूर्तियों में प्राण प्रतिष्ठा हो रही थी / …....
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प्रदीप मिश्र
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[07 Mar 2009 15:17 PM]



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