नए ज़माने में पुरानी माँ

कबीरा खडा बाज़ार में ..... नए ज़माने के हिसाब से ना ढलना था ना ढल पाई माँ बेडरुम और ड्राइंगरुम में फ़र्क नहीं समझती भले ही कोई कितना ही खास आदमी बैठा हो झट सोफ़े पर पसर जाती है माँ लेब्राडोर नस्ल के शानदार चिंकी को इतने बरस बीत गये अभी तक कुत्ता ही कहती है माँ घर का पोंछा लगाती ब... [पूरी पोस्ट]
writer sareetha

कुत्ता

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[07 Mar 2009 12:43 PM]

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