ना त्वम शोचितुमर्हसि

मैनें आहुति बनकर देखा.. पिछ्ले तीन दिन बहुत गहमा - गहमी में बीते हैं , और इतना कुछ देख लिया है कि जीवन के सारे समीकरण बदले - बदले से नज़र आने लगे हैं। दृश्य - १ सोमवार ( यहाँ साप्ताहिक अवकाश इसी दिन होता है ) की शाम कैंटीन से लौटते वक़्त विपिन दिखाई देता है। चेहरे पर चिंता... [पूरी पोस्ट]
writer कार्तिकेय मिश्र (Kartikeya Mishra)
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[13 Nov 2008 05:47 AM]

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