हिन्दी निकष
एक ग़ज़ल : "रोक पाएंगीं क्या ........." रोक पाएंगीं क्या सलाखें दो-? जब तलक हैं य' मेरी पांखें दो । जिसने सबको दवा-ए-दर्द दिया- आज वो माँगता है- साँसें दो । चाह कर भी निकल नहीं सकता- मुझको घेरे हुए हैं बाँहें दो । वो इबादत हो या की पूजा हो- एक मंजिल है...
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आनंदकृष्ण
ग़ज़ल
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[06 Mar 2009 13:30 PM]



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