फर्ज
सागर मंथन में एक बार कभी विषपान किया था शिव तुमने, जीवन मंथन में रोजाना ही गरल पिया है मानव ने हम भी भंग की खा बूटी सच से आंख चुरा सकते थे पीकर एक बार ही विष का प्याला फर्ज से मुक्ति पा सकते थे! कैद से इस निर्गुण शरीर की, आत्मा को अपनी छुडा सकते थे,...
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मीत
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[06 Mar 2009 07:46 AM]



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