GAZAL

राही मासूम रज़ा का साहित्य पटना के बाजार पे हैं तारीख की अब भी निगाहें दिल्ली के दरबार की जानिब (दिल्ली दरबार की ओर से) से वाटें तनख्वाहों दिल्ली की जानिब फैली थीं दानापुर की बांहें चाँदी की झाड़ से झाड़ें आजादी की राहें देश की दुश्मन नहीं बनी थी तब तक गाँठ महाजन की सुनो भाइयो,... [पूरी पोस्ट]
writer डा. फीरोज़ अहमद
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[06 Mar 2009 03:03 AM]

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