कुछ यूं ही

कुछ ग़ज़ल कुछ गीत ! छंद के बंद आते नहीं हैं मुझे, इसलिये एक कविता नहीं लिख सकालोग कहते रहे गीत शिल्पी मुझे, शिल्प लेकिन नयाएक रच न सकाफिर भी संतोष है तार-झंकार से जो उमड़ती हुई है बही रागिनीशब्द की एक नौका बहाते हुए,साथ कुछ दूर तक मैं उसे दे सका-०-०-०-०-०-०-०-०-०-बोझ उसक... [पूरी पोस्ट]
writer राकेश खंडेलवाल
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[05 Mar 2009 21:47 PM]

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