कुछ यूं ही
छंद के बंद आते नहीं हैं मुझे, इसलिये एक कविता नहीं लिख सकालोग कहते रहे गीत शिल्पी मुझे, शिल्प लेकिन नयाएक रच न सकाफिर भी संतोष है तार-झंकार से जो उमड़ती हुई है बही रागिनीशब्द की एक नौका बहाते हुए,साथ कुछ दूर तक मैं उसे दे सका-०-०-०-०-०-०-०-०-०-बोझ उसक...
[पूरी पोस्ट]
राकेश खंडेलवाल
17
2
0
2
5
[05 Mar 2009 21:47 PM]



Shuffle








