ये वादा रहा...
तुम्हारी याद को लिख लेता हूं सबके लिये ये सोचे बगैर कि सब सवाल करेंगे और निरुत्तर हो जाऊंगा मैं... तुम्हारी याद को रख लेता हूं बटुए की उस जेब में... जहां रखा है शगुन का सिक्का, कि पर्स खाली न रहे कभी... तुम्हारी घाव को सी लिया है आज फटे घाव के साथ......
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देवेश वशिष्ठ ' खबरी '
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[05 Mar 2009 14:07 PM]



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