रंग और लफ्जों का खेल

अमृता प्रीतम की याद में..... जब अपने पास सिर्फ एक शाम होती थी हर शाम हम मिलते थे और छोटी सी इस शाम के मद्धिम हो रहे रंगों में चुपचाप एक दूसरे को देखते चलते रहते ..चलते रहते और अपनी शाम पार कर लेते ... फिर वक़्त आया अपनी शाम अपनी उम्र जितनी हो गयी और अपने आंगन में हर रोज़ सुबह के... [पूरी पोस्ट]
writer रंजना [रंजू भाटिया]
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[04 Mar 2009 08:28 AM]

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