तिरे दर से उठे बगैर

फुरसत के रातदिन काटी है पूरी उम्र तिरे दर से उठे बगैर अब जाऊं कैसे मैं तिरे घर से मिले बगैर ज़िंदगी भी हू-ब-हू पहियों के जैसी है चलते हैं साथ साथ बस यूँ ही तेरे बगैर रंजे फुरावा दिल तिरी यादों में डूब कर पाएगा तू भी चैन ना मुझसे मिले बगैर तंगी-ए-किस्मत है औ तूफान ते... [पूरी पोस्ट]
writer अभिषेक
views
23
upvote
5
downvote
0
rating
5
comments
4
[04 Mar 2009 01:52 AM]

Free Vedic Astrology From Astrobix