तिरे दर से उठे बगैर
काटी है पूरी उम्र तिरे दर से उठे बगैर अब जाऊं कैसे मैं तिरे घर से मिले बगैर ज़िंदगी भी हू-ब-हू पहियों के जैसी है चलते हैं साथ साथ बस यूँ ही तेरे बगैर रंजे फुरावा दिल तिरी यादों में डूब कर पाएगा तू भी चैन ना मुझसे मिले बगैर तंगी-ए-किस्मत है औ तूफान ते...
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अभिषेक
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[04 Mar 2009 01:52 AM]



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