खुदा तू भी इतना परेशाँ निकला
मेरे दर्द-ए-इश्क का इक निशाँ निकला ओ चाँद तू भी कितना बेईमाँ निकला मैं जिसकी रात भर राह देखता रहा वो तो मेरी मय्यत का कारवाँ निकला कल मैंने जिसको खंजर से कत्ल किया वो मेरा एक पुराना रहनुमाँ निकला मैं जिसकी आवाज़ के लिए तरसता था वो मेरा सनम बरसों का बे...
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tarun
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[03 Mar 2009 21:11 PM]



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