संशय के बाद

मेरी बतियाँ अपने डर को छुपाकर उसे लिखने थे प्रेमगीत किसी को दिखानी नहीं थीं अपनी कंपकंपाती उँगलियाँ और उन उँगलियों के बीच उलझा संशय उसकी आत्मा अब भी गीली थी प्रेम और उसके इतिहास की भाप में उसे प्रेम के दुश्चक्रों से बाहर निकलना था खुद को दिए दिए फिरना कुछ भी हो... [पूरी पोस्ट]
writer महेन
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[03 Mar 2009 11:15 AM]

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