मन ढूँढ रहा है एक मित्र (२)
मन एक अकेला अभिमन्यु, कैसे सब से लड़ पायेगा? ज्यादा से ज्यादा यह होगा, इतिहास पुनः दोहराएगा. चाहों का रच कर चक्रव्यूह, मन की सेनाओं ने घेरा, इस पर मुझको अधिकार मिले, यह मैं लूँगा, यह है मेरा. कितना है कठिन युद्ध करना, जब साथ नहीं हो कृष्ण कोई, बिन गु...
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Suresh Chnadra Gupta
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[02 Mar 2009 22:58 PM]



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