कछुआ हारल, खरहा जीतल (बचवन खातिर पर रउओं सुनि सकेनी)

भोजपुर नगरिया लल्ला-लल्ली, गुड्डू-गुड्डी! आजु हम तोहलोगन के कछुआ अउरी खरहा के एगो नया कहानी सुनावे जा तानी। ए कहानी में दउड़ (रेसि) में कछुआ नाहीं बलकी खरहा मरलसि बाजी, कवनेगाँ? तS सुनS जा :- नदी के किनारे की जंगल में एगो कछुआ अउरी एगो खरहा साथे-साथे रहत रहने कुलि... [पूरी पोस्ट]
writer प्रभाकर पाण्डेय
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[02 Mar 2009 05:24 AM]

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