क्रांति कथा
छावनी में पटना की आते थे अक्सर एक मुल्ला उजली दाढ़ी, उजला कुरता और उजला पाएजामा मुद्दत तक गोरे नहीं समझे क्या मक़सद था उनका रखके किताबों में लाए थे शहर से वह संदेसा आजादी के दीवाने को फिक्र नहीं थी तन मन की सुनो भाइयो, सुनो भाइयो, कथा सुनो सत्तावन की...
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डा. फीरोज़ अहमद
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[02 Mar 2009 03:07 AM]



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