दीप , दीप क्यूँ हैं ?

लम्हें जिन्दगी के मैं खडी़ की खडी़ रह गई और मेरे साथ वाले मुझ से कौसों आगे निकल गये । मुझ से बहुत पीछे वाले भी आगे बढ़ते रहे और मैं…… वहीं की वहीं । ना जाने जिन्दगी क्या चाहती थी । उस अन्धेरे से भरी जिन्दगी में कुछ साथ रुकने को तैयार नहीं … बस मैं और... [पूरी पोस्ट]
writer hemjyotsana "Deep"
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[01 Mar 2009 18:19 PM]

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