काले बंदर का बाल, मसक्कली, और गली का चौकिदार...
अब एक महिना पूरा चला गया नई पोस्ट के लिये. पता नहीं , मन में कई छोटे बडे विचार आकर ऊंगलीयों के कोने तक टंग जाते हैं, और की बोर्ड पर फ़िसलने को आतुर रहते है.एक कहानी की शक्ल की रेत की मूर्ति हर दिन मन में बनती है, और दूसरे दिन समय के समंदर की लहरों में...
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दिलीप कवठेकर
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[28 Feb 2009 16:14 PM]



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