कुत्ता कहीं का...
कब का आ चुका है। दो महीने गुजर भी चुके हैं। अचानक याद आया कि इस साल अभी तक हमने कुछ लिखा ही नहीं। सोच रहा हूं कहीं लिक्खाड़ लोग मुझे बिरादरी से बाहर न कर दें। इसीलिए कुछ तो लिख ही डालता हूं। नए साल के दो महीने गुजर चुके हैं। सब ठीक ही चल रहा है।...
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रवीन्द्र रंजन
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[28 Feb 2009 09:26 AM]



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