अब इस कदर भी उजाले न हो---
अब इस कदर भी उजाले न हो। घर आग के निवाले न हो। प्यासी हलक से गुज़रे न जब तलक, नदी समन्दर के हवाले न हो। बोल प्यार के हो ग़ज़ल की राह में, न हो मस्जिद और शिवाले न हो। सूरज अबके ऐसी भी धूप न बाँटे, कि पहाड़ पर बर्फ़ के दुशाले न हो। खुशियों की मकड़ियों का वहा...
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प्रकाश बादल
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[28 Feb 2009 09:11 AM]



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