वो सुबह कभी तो आएगी...
बनते फूटते बुलबुलों में भी ढूंढ लेता है इन्द्रधनुष के हजारों रंग पल दो पल भर के लिए ही सही, आज कल भर के लिए ही सही मन के खिलौनों और सपनों के खेल में उलझा ये मजबूर आदमी बरसों चलने के बाद भी रहता है वहीं का वहीं मील के पत्थर की तरह किसी एक जगह रुका सा...
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Rakesh
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[28 Feb 2009 07:14 AM]



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