कुछ भी खोने का साहस नहीं बचा है मन में
उगना रे मोर कितै गेला परसों घर से किताब लेकर निकला। हालाकि किताब और कलम लेकर निकलना मेरी आदतों में शामिल हो गया है। जब से होश सम्हाला है मुझे याद नहीं कि कभी घर से बिना किताब या कलमे के निकला होऊँ। मुझे याद नहीं कि कभी किसी से कलम माँग कर कुछ लिखा हो...
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बोधिसत्व
खोना
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[27 Feb 2009 05:42 AM]



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