कसैली संभावना: मंदिर की सीढियों पर बैठकर

नई इबारतें धूपबत्तियों से घिरे भगवान को देखकर मुझे मुर्दे की याद आती है. वैसे श्रद्धा के सांप का जहर उतर चुका है फिर भी गाहे बगाहे मंदिरों की सीढियां चढ जाता हूं. हंसी की तलाश में. हिंसक वक्त में आस्था के केंद्रों का विद्रुप देखना भी खासा मजाकिया होता है. इस तर... [पूरी पोस्ट]
writer सचिन ..........
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[27 Feb 2009 05:39 AM]

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