बस में बैठे
बस में बैठे बैठे आंखें भर आना।याद आज तक है वो तेरा शहर जाना।कभी समन्दर की तूफ़ानों की बातें;और कभी हल्की बारिश से डर जाना॥बाग़ कट चुके,खेतों में सड़कें दौड़ीं;कैसा गाँव कहां छुट्टी में घर जाना॥किसने लिख दी जीवन की ये परिभाषा!ज़िन्दा रहने की कोशिश में मर ज...
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Dr. Amar Jyoti
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[26 Feb 2009 22:51 PM]



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