दो प्रेम कविताएं और एक बेचैनी का बयान
मेरे लिए प्रेम कविताएं लिखना उतना ही मुश्किल रहा है जितना किसी क्राइम रिपोर्टर के लिए धार्मिक बीट देखना. मेरी जान सूख जाती है. होंठ सूख जाते हैं, पेट में बल पडने लगते हैं. शब्द, मुहावरों समेत मुंह फेर लेते हैं और कांपती उंगलियां की-बोर्ड पर यूं बैठती...
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सचिन ..........
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[25 Feb 2009 04:24 AM]



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