रात की नीम अंधेरी बाँहें
क्या स्नेहा नहीं जानती थी कि कितनी दुविधा में ये कदम उसकी ओर बढ़ रहे थे, बीते दिनों कि बेड़ियाँ आसानी से किसे मुक्त होने देती है अगर वह जानती थी तो फ़िर किस मिटटी की बनी थी जो इतना अपनापन दिखाने के बाद भी निरपेक्ष बनी रह जाती हर बार। श्याम वर्ण सुघड़ स्...
[पूरी पोस्ट]
Kishore Choudhary
दिल-ऐ-नाकाम
23
0
0
0
3
[24 Feb 2009 22:59 PM]



Shuffle








