भगवान बेच कर रोटी खरीदने की कोशिश...
कविताएं लिखने, किसी और की कविताएं पढ़ने और उन्हें सहेजकर रखने की मेरी पुरानी आदत है। एक कविता जो आज से आठ-नौ साल पहले प्रभात खबर के रविवार के अंक में छपी थी, उसकी कतरन अन्य कतरनों के साथ पड़ी हुई थी। आज अचानक कतरनों को उलटते वक्त उस पर नजर गयी और कई बा...
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सुनील मंथन शर्मा
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[24 Feb 2009 14:25 PM]



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