ये कैसे दिन हैं ????

मेरे आस-पास ये कैसे दिन हैं पैर लकीरों से बाहर चलना चाहते हैं कंधे संस्कारों के बोझ से मुक्त होना चाहते हैं माथे पर मोहब्बत का परचम नहीं बस शिकन है शिकवे शिकायत की गूंज है आंखों के खुश्क समंदर में कोई ख्वाब नहीं, किरच है ये कैसे दिन हैं पैरों के नीचे गरम गारा है... [पूरी पोस्ट]
writer MANVINDER BHIMBER
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[24 Feb 2009 11:54 AM]

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