अपने भीतर के काले बन्दर को देखने की कमज़ोर कोशिश...दिल्ली-६
दिल्ली-६ कई मायनो में ख़ास फ़िल्म होते-होते रह जाती है.यह अक्सर होता है कि जब कोई निर्देशक एक बढ़िया फ़िल्म दे देता है तब उससे दर्शकों की उम्मीदें अधिक बढ़ जाती हैं.क्योंकि तब वह अपना एक दर्शक वर्ग बना चुका होता है.'रंग दे बसंती'से राकेश ने हिन्दी सिन...
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मुन्ना पांडेय(कुणाल)
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[24 Feb 2009 02:11 AM]



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