शायरी गयी शायद

फुरसत के रातदिन बयाज़े शेर तेरे साथ ही गयी शायद मुझे अज़ीज़ थी जो शायरी गयी शायद कभी कभार ही वो नज्में अब उतरती हैं तुम्हारे साथ मेरी माहिरी गयी शायद मैं कबसे रूठा हूँ तुझसे मेरी जाने वफ़ा कि अब ये लगता है दोस्ती गयी शायद बुझा हूँ मेह से मैं एक चराग़ की माफिक मेरा य... [पूरी पोस्ट]
writer अभिषेक
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[22 Feb 2009 23:54 PM]

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