"झील को दर्पण बना "
झील को दर्पण बना" रात के स्वर्णिम पहर में झील को दर्पण बना चाँद जब बादलो से निकल श्रृंगार करता होगा चांदनी का ओढ़ आँचल धरा भी इतराती तो होगी... मस्त पवन की अंगडाई दरख्तों के झुरमुट में छिप कर परिधान बदल बदल मन को गुदगुदाती तो होगी..... नदिया पुरे वेग...
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[22 Feb 2009 21:57 PM]



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