अनुत्तरित ही

कबीरा खडा बाज़ार में ..... पूछता हूँ तुमसे मैं कृष्ण उकसाया क्यों तुमने पार्थ को तुम तो परात्पर थे टाल सकते थे युद्ध बचा सकते थे पृथ्वी को रक्त में नहाने से ओ मायावी तुम फ़ूट सकते थे दुर्योधन के दिग्भ्रान्त हृदय में वैराग्य का अंकुर बन कर उसकी महत्वाकाँक्षा के दावानल पर छिड़क सक... [पूरी पोस्ट]
writer sareetha
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[22 Feb 2009 06:52 AM]

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