खुशी चाहिए, अपने अन्दर झाँकों
एक कहावत पढ़ी थी बचपन में, 'कस्तूरी कुंडली बसे, मृग ढूंढे वन माहीं', इसका अर्थ भी पढ़ा था, भावार्थ भी, पर कितना समझ पाये? आज भी तलाश रहे हैं हम, खुशी यहाँ-वहां, इधर-उधर, पर नहीं झांकते मन के अन्दर, छुपा है जहाँ, खुशी का असीमित भण्डार....
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Suresh Chnadra Gupta
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[21 Feb 2009 23:02 PM]



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