बिष उगलता आया हूँ
में नदी के नीर सा, बहता गया एक ओर अनगिनत सपनों से होकर, मैं बहा किस ओर | मैं बहा किस ओर , मुझको क्या ख़बर है, मंजिल की दिल में चाह, सिने में सबर है | उद्गम में जो उन्माद था, कुछ थम सा गया है | अंत का साया भी, कुछ गहरा गया है हर किनारे पर कई सपने सजा...
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Tapashwani Anand
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[21 Feb 2009 08:07 AM]



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