बस अब आ भी जाओ......
जिस को देखूं साथ तुम्हारे , मुझ को राधा दिखती है, दूर कहीं इक मीरा बैठी, गीत तुम्हारे लिखती है। तुम को सोचा करती है, आँखों में पानी भरती है, उस पानी से लिखती है, लिख के ख़ुद ही पढ़ती है। यूँ ही पूजा करते करते, कितने ही युग बीत गाये, आँखें बंद किए आँख...
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गोविन्द K. प्रजापत "काका" बानसी
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[20 Feb 2009 08:14 AM]



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