मेरा शहर
न मात्राओं का गणित है और न ही शब्दों की बंदिश, यह भावनाएं हैं जो चंद लाइनों मैं ब्लॉग पर हैं, इसलिए पड़ते समय भावनाओं को समझें - यह शहर नही है, अब इंसानों का शहर हेवानियत हर और यहाँ आती है नजर बहन- बेटियों की अस्मत घर मैं नही सलामत कत्लगाह बन गया हैअब...
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शिवराज गूजर.
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[19 Feb 2009 09:47 AM]



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