देखो देखो देखो देखो, उजड़ चले गाँव रे ।पेडों के साथ गई, पेडों की छाँव रे॥

आत्मदर्पण साथियों विगत दिनों मेधा बहन के यहाँ घाटी मैं जाने का मौका मिला घटी की स्तिथि पर कुछ लिखने की कोशिश की है आपकी टिप्पणियों का स्वागत है देखो देखो देखो देखो, उजड़ चले गाँव रे । पेडों के साथ गई, पेडों की छाँव रे॥ हम माझी बन खेते रहे, समय की धार को । जाने... [पूरी पोस्ट]
writer प्रशांत दुबे
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[19 Feb 2009 06:09 AM]

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